Thursday, February 19, 2015

शिव-स्तुति


हे शंकर, हे आशुतोष,
भाव बाधा मेरी दूर करो|
कितना भ्रम है, कितनी माया,
दंभ,लोभ के कंट-जाल से,
व्याकुल मन है, शिथिल है काया,
ज्ञान दीप की ज्योति जलाकर,
ह्रदय-कलुष का नाश करो,
नमामि शिव, हे रुद्रेश्वर,
त्वम् शरने, अभयं कुरूम|
कितना संशय, कितनी असूया,
स्वार्थ भाव की अंधमता से,
संबंध विभाजित, मिलन अधूरा, 
प्रेम-सरित के सलिल प्रवाह से,
प्यासे मन को सिक्त करो,
नमामि शम्भू, हे गंगाधर,
त्वम् शरने, प्रमुदित कुरूम|

कितने स्वप्न, कितनी इच्छायें,
लक्ष्य की गुरुता से हतप्रभ, 
कर्तव्य अनिश्चित, दुर्गम पथ है,
दृढ़ निश्चय के अजस्त्र स्रोत से,
विजयी-पथ प्रशस्त करो,
नमामि पशुपति, हे नीलकंठ,
त्वम् शरने, धीरम कुरूम|
हे शंकर, हे आशुतोष,
भाव बाधा मेरी दूर करो|

Wednesday, February 11, 2015

कट गया तो क्या हुआ?

कट गया तो क्या हुआ?
वक़्त की रफ़्तार से पीछे छूटे,
अपने हुनर, तमाम कोशिशों और वर्षों के परिश्रम को,
ताक रख, घबडाये,
तुम सोचते हो,
कुछ फाडू करने का समय निकल गया,
और गन्दा वाला कट गया,
दोस्त! तुम्हें प्रतीत होता है ऐसा,
Basically, कटता नहीं है|

जब देखते हो दूर से ही उसे,
उसकी वो Hair Style, दीप्त चेहरा और सुगठित बदन,
उसके सामीप्य को उत्कंठित, अधरास्पर्श के अभिलषित,
स्मरण मात्र से ही हो जाते हो जीवंत,
कुछ missed calls, G-talk and WhatsApp के छिटपुट chat के बाद,
तुम्हें लगता है- बात बन नहीं रही,
और सोचते हो- मैं तो हूँ ही एक नंबर का ‘चू, चू’,
फिर कट गया और उसे पा न सका,
दोस्त! मिथ्याभास है तुम्हारा,
Actually, कटता नहीं है|

बचपन में पढ़ा था,
नम्रता सज्जनों का भूषण है,
जो स्वयं के प्रतिकूल है,
वैसा आचरण दूसरों के साथ उचित नहीं,
ऐसी प्रवृत्ति लिए, तुम साफ़ दिल से,
करते हो अपना व्यापर,
परन्तु, संकुचित मानसिकता लिए लोग,
जब स्तरहीन व्यहवार करते हैं,
तुम्हें लगता है, ये तो मेरी ही कमज़ोरी है,
चालक न होने के कारण कट गया,
दोस्त! लगता है तुमको ऐसा,
Long term में कटता नहीं है|

इसी तरह जीवन में,
सम्यक संकल्प, निश्छल भाव व उद्दाम उत्साह लिए,
अपनी जांनिसार हसरतों की हासिल को,
तुम पुरजोर कोशिश करते हो,
कदम दर कदम, चट्टानों और चोटों से,
घायल और थके, तुम सोचते हो,
वो और होंगे जिन्हें मिलती होगी मंजिल,
सब कुछ करने के बाद भी, मैं खाली हाथ ही रहा,
और अंततः  कट गया,
फिर बोलूँगा दोस्त! तुम सोचते हो ऐसा,
कटता नहीं है really |

सुनो! अच्छा ये बताओ,
तुम्हें क्या लगता है?
नीयत गलत है तुम्हारी?
या फिर कोशिश में कमी या तरीका गलत है?
सब जान-समझ कर किये सच्चे प्रयास के बाद भी,
यूँ हताश क्यूँ हो जाते हो?
क्या तुमने सच को सच नहीं कहा?
झूठ को ‘झूठ’ न कहते हुए भी, क्या पहचाना नहीं?
या जहाँ भी गरिमा, सरलता व सौंदर्य दिखा, मन ही मन उसकी पूजा न की?

तो क्या हुआ यदि दिखाने को तुम्हें,
वाह्य, भव्य उपलब्धियां नहीं,
क्या हुआ जो वह नहीं मिली?
जंग में हार जीत तो होती ही है,
और कोई भी Chance, Last Chance नहीं होता,
संभालो खुद को,
आंसू आते हैं तो रोको नहीं,
जाओ और छिपकर,
दीवार को माँ समझ, जी चाहे रो लो|

उठना फिर उस सोने के बाद,
पुराना सब कुछ भुला के,
उसी संकल्प और तपस्या के साथ,
एक बार फिर अपना सब कुछ देने को,
इस बार तुम्हारी आखों में आंसू नहीं,
चेहरे पे मुस्कान होगी,
और तुम समझ जाओगे कि,
जब तक खुद न कटवाओ,
कटता नहीं है|


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