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Wednesday, March 10, 2010

Exhaustion

How many times will I have to undergo such pangs of existence? What sort of cruel restraint it is when you feel like dying and are not able to cry for help.

So much have I suffered to say you goodbye (which is like parting with my own self). I just wanted to test whether I really loved? How deep this love was? What strength did it have? I have burnt, have consumed my entire self in the fire of that union.

I am afraid of myself. I am afraid of those experiences, the separation without union, the desertion forever. I don't have capacity to go on like this, when my beloved is away from my field of existence.

O love, if I have truly loved, if I have truly burnt, then please liberate me. Save me, engulf me, my lovely love. I love you too much. I love you so much that I cannot even express it.

The love that I carry is immortal.

Go, but this love will keep me alive and the day will come when this existence will be burnt to ashes at the altar of your being, O my love!

Darkness

Have you ever seen darkness? All impending, trembling, shaking itself?

How to say? how to make you reveal that I have seen - those pangs, the constant struggle through it, the continuous search for a ray of light - which is hope.

I didn't know that cruelty is so cruel. I am going to give up, you hear? - I will! cause, I am not able to muster enough strength for standing here.

Love? you know?- how have I been into this word and after all that what I find is sheer emptiness. Love to whom? for what? If you are you and I am I, how can we love? What does it mean to love?

It is so incomprehensible and I have given up. You hear? - I have given up.

I will be lost dear. O friend! I will be lost and along with that- this friendliness.

Thanks, thanks a lot for letting me cry, holding you my dear.

Watch

O love!-be joyous.

I love you silently. Sweet beauty, you are full of energy. Fly and flow, never to stagnate.

And I will just see you running, will see you playing and dancing unhindered.

Lovely love, I carry your memories and cry alone for reasons unknown.

Who are you? - who has held me in such an unbreakable bond?

जीवन

जीवन यदि प्राची से उदित दिवाकर की आभायुक्त रश्मियों की भांति लालिमा युक्त व उद्भासित है, वहीं तुषार के धुंधलके में छिपा कोई रहस्यात्मक आवरण है.

जीवन की विभिन्न अनुभूतियाँ मनुष्य के अन्तरतर में विभिन्न रंगों का प्रवाह उसी प्रकार कराती हैं यथा विभिन्न रंग विन्यासों में अंकित कोई चित्र विभिन्न कोणों से भिन्न भिन्न बिम्बों को धारण करता है!

तलाश

यद्यपि जानता हूँ कि संवेदनाओं के प्रभाव छेत्र (Domain) में ,
अनुभूतियों के परास (Range) का वृहत (Universal) समुच्चय (Set) हूँ मैं,
फिर भी कौन सी अंतहीन गवेषणा (Search) है? - पता नहीं,
खुद में सार्थक व्यक्तित्व की तलाश है मुझे!

स्वर्ग

काश ऐसा होता!
काश ऐसा होता,
प्रातः उदित सूर्य की रश्मियों का प्रथम सुखद स्पर्श,
उसी ताजगी के साथ दिन भर हमारे साथ रहता,
रात्रि के चन्द्रमा का धीमा, पीत, शीतल प्रकाश,
हमारी शय्या का बिछावन बन हमें लपेटे रहता,
नव कुसुमित पुष्पों का उत्साहपूर्ण स्मित अपनी निश्छलता
और पवित्रता के साथ हमारे अधरों पर खेलता,
काश ऐसा होता!

काश ऐसा होता,
कि जीवन की लम्बी यात्रा में गंतव्य को न जानते हुए भी,
फिर भी चलना तो है ही, अतः हम मस्तमौला पथिक की भांति,
संशय, हताशा, भय, अवसाद छोड़ प्रतिपल आनंदित गतिमान रहते,
काश ऐसा होता!

काश ऐसा होता,
कि कभी न ख़त्म होने वाली हमारी इच्छाएं इतनी छोटी व सरल हो जातीं,
कि उनकी तुष्टि असंभव न रहती,
संतोष रुपी धन का धैर्यपूर्वक कोष सदैव हमारे साथ रहता,
जिससे हम अविचलित, अनुद्द्हत, संतुष्ट व सुखी होते,
काश ऐसा होता!

काश ऐसा होता,
कि असफलताओं की पीड़ा हमें चोटिल नहीं करती,
सफलताओं की प्राप्ति हमें अकेला नहीं करती,
हम सफलता, असफलता से परे होकर शुद्ध खेल भावना से प्रेरित,
एक साथ मिलकर सफल होते,
काश ऐसा होता!

काश ऐसा होता,
कि हमारे कदम एक साथ बढ़ते,
हमारी प्रवृत्तियां - स्वस्थ, सुन्दर व सुखकारी होतीं,
तथा हमारी एकता अखंडित रहती,
काश ऐसा होता!

काश ऐसा होता,
कि निर्धनता का क्रूर दैत्य सदैव के लिए नष्ट हो जाता,
सम्पन्नता व समानता का सावन का मेघ गरज कर बरस पड़ता,
और सुख की जीवनदायिनी सरिता आनंद के महासागर में समा जाती,
काश ऐसा होता!

काश ऐसा होता,
कि हमारा अहम् इतना व्यापक होता जो सब कुछ स्वयं में समाहित कर ले,
अथवा इतना सरल कि गलित होकर स्वयं को पूर्णतया विस्मृत कर दे,
सौंदर्य का दर्शन मात्र आकर्षण न होकर,
हमें पूर्णतया बींधकर सदैव आलोकित कर देता,
काश ऐसा होता!

काश ऐसा होता,
काश ऐसा ही होता,
काश ये सब कुछ होता,
तो क्या ऐसे सुन्दर, सलोने, सुखद व सुरक्षित स्वपन को ही हम स्वर्ग नहीं कहेंगे?
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This work by Chaitanya Jee Srivastava is licensed under a Creative Commons Attribution-Noncommercial-No Derivative Works 2.5 India License.
Based on a work at chaitanya-insearch.blogspot.com.