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Monday, November 16, 2020

अंतर्रात्मा की आवाज़

ओ अमूर्त कल्पना के सजीव चित्र,

कितनी तीक्ष्ण है तुम्हारी अन्स्पर्श छुअन,

देह, मानस और आत्मा को चीरती हुई,

मुझमें द्रवित और खुद में मुझे डुबोती हुई,

जैसे मन-मीन का आनंद-सरिता में उन्मुक्त प्लवन|

 

कुछ भी पा जाऊं, अधूरा है मेरा प्राप्त,

यश, धन और ये सामाजिक सरोकार,

क्यूँ नहीं देते मुझे जीवित होने का भान?

कितना भी जी लूं, नहीं भर पाती वो श्वास,

तुम्हारे सानिध्य में मैं जो भर पाती उड़ान|

 

जीवन यदि द्वंद्व-मरुस्थल है, फिर यह प्रेम-मरीचिका क्यूँ?

जन्मों का विरह और फिर मिलन, मिलन यह अपूर्ण क्यूँ?

चलते जाते हैं पड़ाव दर पड़ाव, गंतव्य है भी कोई?

अनेकों ऐसे प्रश्न मेरे, उठते बार बार,

कब तक मैं करूँ उपेक्षित अपनी अंतर्रात्मा की आवाज़|

 

कहाँ मिलेगा वो ध्येय, तदार्थ समर्पित कर सकूं स्वयं को?

कहाँ मिलेगा वो स्तोत्र, मुक्ति-रस पी सकूं जिससे छक कर?

कहाँ मिलेगी वो आग, तप कर जिसमें निखर जाऊं?

कहाँ मिलेगा वो कान्हा, जिसकी राधिका बन जाऊं?

ऐसे प्रश्न मेरे अनुत्तरित, उठते बार बार,

कब तक मैं करूँ उपेक्षित अपनी अंतर्रात्मा की आवाज़|

Saturday, January 25, 2020

प्रतिश्रुति


ओओ-ओओ, आयेंन-आयेंन, क्वाँआँ-क्वाँआँ,
देखो! मैं अवतरित हो गया,
माँ के गर्भ में बाहर आने की आकुलता थी,
और बाहर का यह संसार,
मेरे लिए एक वृहत रहस्य|

बस सोता हूँ और रोता हूँ,
रोता भी कहाँ हूँ?
यह तो मेरा संवाद है,
उस जगत से,
जहाँ से मैं आया हूँ|

तुम मुझमें अपना बचपन देखते हो,
और मैं तुममे अपना भविष्य,
बस प्रेम की भाषा समझता हूँ,
रूप मेरे लिए अपरिचित है,
भावों की ध्वनि सुनता हूँ मैं,

ये पौधे, चिड़िया, तितली और फूल,
सब मेरे दोस्त हैं,
निर्दोषता के पालने पर,
हम साथ-साथ झूलते, खेलते और हँसते हैं,
तुम भी आओ और खेलो मेरे साथ|

मम्मी मुझे अंक में भर दूध पिलाती हैं,
मोहक कपड़े पहना मुझे आकर्षक बनातीं हैं,
पापा मुझे देख मुस्कुराते और रोचक लोरियां सुनाते,
साथ मिलकर हम ओमकार करते,
ॐ – जिसमे समस्त ब्रम्हांड का कम्पन निहित है|

शनैः शनैः मैं परिचित होऊंगा,
इस सृष्टि और इसकी विविधिताओं से,
मानव-जीवन और इसकी जटिलताओं से,
जो अमीर-गरीब, स्त्री-पुरुष, वर्ण-वर्ग के द्वंद्वो से परे,
सबके लिए समान है|

मुझसे सभी प्यार करते,
क्यूंकि मैं मानव का भविष्य हूँ,
उसकी सभ्यता व संस्कृति का वाहक,
इसीलिए इतिहास समझते हुए मुझे वो गलतियाँ नहीं करनी,
जिनके दुष्परिणाम मानव जाति भुगत चुकी है|

प्रगति क्या है? प्रकृति से हमारा सहचर का नाता कैसे हो?
दुःख क्यूँ है? इसका समूल निवारण कैसे हो?
क्या अविभाजित मानव संभव है?
देश प्रेम और कट्टरता, संकीर्णता व व्यापकता का अंतर क्या है?
इन सब प्रश्नों का उत्तर ढूंढना होगा|

मैं ही मानवता का पुण्य हूँ, मैं ही उसमें छिपा दानव,
इस अन्तर्निहित विरोधाभास को आत्मसात करते हुए,
सही राह पर संभल कर आगे बढ़ना होगा,
भय, ईर्ष्या, मोह, अहंकार, क्रोधादि मनोवेगों से निर्मित,
इस भाव-संसार को तरना होगा|

जिम्मेदारियां बड़ी हैं, किन्तु असाध्य नहीं,
मंथन कर मुझे संधान करना होगा उस ‘शाश्वत’ सत्य का,
जिसके आनंद-गान से मैं सबके जीवन को संगीतमय कर सकूं,
यही मेरे आने वाले जीवन का संकल्प है,
यही है मेरे अस्तित्व की प्रतिश्रुति |


Tuesday, May 7, 2019

अतिथि


अतिथि! सुना है तुम आ रहे हो,
स्वागत करता हूँ,
सच कहूं! कुछ संशय में हूँ,
क्या तुम्हें निमंत्रण देना उचित था?
क्या अभी भी रोक दूं तुम्हें आने से?

विविधताओं, अनिश्चितताओं से भरा यह संसार,
गूढ़ रहस्यों और जटिलताओं से भरा यह जीवन,
इस आमंत्रण से तुम्हारी मुश्किलें तो नहीं बढ़ा दी मैंने?
विचारों के इस गुम्फन से थकित और व्यथित होता हूँ,
फिर भी! चल पड़े हो तो आओ, स्वागत है |

तुम्हारी क्या और कैसे मदद कर पाऊंगा?
भौतिक सुख की सारी सुविधाएं उप्लब्ध होंगी यहाँ,
फिर भी इस साधन मात्र से तुम प्रसन्न रहोगे ?
संदेह है मुझे,
चलो! सिधार्थ की कहानी सुनाता हूँ|

अनेकोनेक भोग-विलासों में निमज्जित रहने पर भी,
सिधार्थ प्यासा था - पीड़ित तथा व्याकुल,
उसकी विकल वेदना में सत्य की अभिलाषा थी,
अनुसंधित्सु! तडपा और भटका वह,
गहन आत्मान्वेषण के प्राप्य ने सिधार्थ को बुद्ध बना दिया|

अतिथि! कितना कुछ कहना चाहता हूँ,
लेकिन मैं स्वयं ही यहाँ असहज अनुभव करता हूँ,
मेरे यहाँ होने का उद्देश्य क्या है?
कब आएगा वो पल ?
जब मैं निश्चिन्त इस कोलाहल से विदा ले पाउँगा,

क्या तुम भी मेरी तरह इसी भांति विचलित होगे?
हाँ मैंने बुलाया था तुम्हें,
तुमसे मिलने की उत्कंठा थी,
तथा अस्तित्व की चुनौतियों से तुम्हें परिचित कराने की ग्लानि भी,
स्नेह स्वीकार करना और अपराध क्षमा|

देखो! ये पेड़, ये फूल, ये चहचहाते पक्षी, ये फुदकती गिलहरी,
ये हवा, यह बहता पानी,
सब आत्मनिर्भर, स्व-प्रेरित, स्वतः गतिमान हैं,
संचालित हैं,
उस सर्वत्र गुंजायमान मौन के कम्पनों से|

हे अतिथि,
तुम भी स्वावलंबी बनना,
परिश्रमी, धैर्यशाली, सुख-दुःख में समान,
विनम्र, विवेकी, और संवेदनशील,
करुणामय, सबको साथ लेकर चलना|

आनंद बटोरने में नहीं,
अर्जित कर उसे बांटने में है,
इस अमृत-वाणी को,
प्राणों में बसा, जीवन का आधार बना,
अपना पथ प्रशस्त करना|

आओ अतिथि मित्र!
तुम्हारा अभिनन्दन!

Thursday, January 31, 2019

तुम ही तो हो


सुबह की खिलखिलाती किरणों में,
जब देखी मैंने परछाई फूल की,
और फिर देखा,
स्वाभिमान की आभा से मंडित,
कुसुमित उस फूल को,
जो था अपनी गरिमा में शोभायमान,
आहिस्ता से, दिल के कोने से कहीं,
ये आवाज़ आई,
यह गर्वित, पुष्पित शोभा तुम ही तो हो|

चलते-चलते,
जब थक गया मैं,
स्वेद-स्नात, हैरान और परेशां,
सोचते हुए ये,
कैसा ये सफ़र, मंजिल है कहाँ?
उस समय जो चली शीतल मंद बयार,
दिल के कोने से
, आहिस्ता से,
वही आवाज़ आई,
ये ठंडा एहसास तुम ही तो हो|

ज़िन्दगी की जंग में,
लड़ता रहा, गिरता रहा,
गिरते डरते, उठते, सीखते हुए,
अनवरत प्रयासों से,
जब पार की जीत की वो रेखा,
मेरे मन ने मुझसे, आहिस्ता से,
फिर कहा,
तमाम हासिलों की धडकनों में,
तुम ही तो हो|

सुकून की तलाश में भागता रहा पाने को,
दौलत और शोहरत,
बहकता रहा,
न जाने किन गलियों में,
अनेकों उपलब्धियों-प्रशस्तियों के बावजूद,
जब वो मुखड़ा देखा तुम्हारा,
अंतर्मन से, आहिस्ता से,
फिर वो ही आवाज़ आई,
सुकून तुम ही तो हो|

Sunday, November 18, 2018

जन्म-दिवस


वह मिला मुझे गली के उस मोड़ पर,
थोडा व्यग्र, थोडा निराश,
देख उसे सोचा मैंने,
क्यूँ पडूं इन चक्करों में?
मेरी खुद की दशा क्या बेहतर है?
किन्तु पता नहीं क्या था उसकी दृष्टि में,
मैं जाते जाते ठहरा और पूछा,
भाई! कोई help चाहिए ?

देखा उसने,
पर बोला नहीं कुछ,
और फिर बोल पड़ा,
अच्छा सुनो! बैठोगे थोड़ी देर ?
बड़ी थकान लग रही है|
थका तो मैं भी था,
पता नहीं किस वजह से?
बैठ गया,

हम दोनों आश्चर्यजनक तरीके से चुप रहे-बैठे रहे,
धीरे से उसने कहा,
आज मेरा जन्म-दिवस है,
और मुझे न जाने क्यूँ इस दिन बड़ी प्यास लगती है,
“Happy b’day to you” -मैंने हाथ बढ़ाते हुए कहा|
मौन रहते हुए ही उसने स्वीकार की मेरी शुभकामना,
उसकी प्रतिक्रिया-विहिनता पर,
मैं सोचने को विवश था|

रास्ता भूल गया हूँ मैं,
कहाँ जाना है आखिर ये भी पता नहीं,
रूक जाऊं तो कहीं छूट न जाऊं,
इसी डर से चलता जाता हूँ,
हर साल जब लोग मुझे इसी दिन बधाई देते हैं,
मेरी थकान बढ़ जाती है,
और मिथ्या की इस मरीचिका से न बुझने वाली,
मेरी प्यास और विकल हो जाती है,

ये कहते-कहते वह रो पड़ा,
उसके रुदन में उसके पूरे वजूद की पीड़ा का दर्द था,
अजीब सी ही थी उसकी आवाज़,
जिसमें मुझे स्वयं की,
और न जाने कितने ही आवाज़ों की गूँज सुनायी दी|
थोड़ी देर हम चुप रहे,
फिर उसी वेदना-पूरित स्वर में उसने क्रंदन किया,
ऐसी सस्ती ज़िन्दगी का क्या मतलब यार?

मेरी थकान और प्यास को भी,
कुछ दिशा मिल रही थी,
कुछ टटोल रहा था मैं भी,
और अचानक आंसू छलक पड़े,
उसने छू दिया था अस्तित्व-सितार का वो तार,
जो पता नहीं कब से झंकृत ही नहीं हुआ था,
यद्यपि प्रति-वर्ष इस सितार की विधिवत पूजा होती है,
मिठाइयों और बधाइयों के साथ|

मैंने उसकी तरफ देखा,
और एक चांटा जड़ दिया,
वह उसी तरह शुष्क और मौन ही रहा,
मैंने कहा,
अरे यार!
बदले में मार तो देते,
मुझे अभी ठीक से रोना था,
धुलना चाहता हूँ मैं|

पता ही नहीं चला,
करीब घंटा गुजर गया था,
दुनिया की दौड़ की पुकार को,
अनदेखा कर,
हम बैठे रहे,
हम दोनों ही अब,
न जाने क्यूँ,
सहज और हल्का महसूस कर रहे थे|

जानते हो?
इस डर से इतना डरने की ज़रुरत नहीं,
हाँ- डर तो लगता है,
क्यूंकि पता नहीं जाना कहाँ है,
जहाँ सभी जा रहे हों,
वही सही रास्ता हो – ज़रूरी तो नहीं,
और क्या बाकियों को पता है,
कि जाना कहाँ है और क्यूँ?

पर जाना तो पड़ेगा ही
यहाँ नहीं तो वहाँ,
निकल कर ही तो ज्ञात होगा,
कि रास्ते में क्या है?
ये हर पड़ाव पर पहुँचने का दर्द,
और पहुँच जाने की विशिष्टता,
इन समस्त जय-पराजय, हर्ष-विषाद की अनुभूतियों का समुच्चय ही,
क्या पता गंतव्य हो?

या फिर न हो,
कुछ भी न हो,
किन्तु खोजकर ही पता चलेगा ना,
कि अनुसंधानार्थ कुछ है भी या नहीं?
तो फिर? मैंने प्रश्न किया,
यह भ्रमण, यह अन्वेषण की प्रक्रिया ही है जीवन?
हाँ!,
अब फिर से wish करोगे मुझे?

एक और साल का तोहफा मुबारक मित्र!
समय के इस उपहार से,
तुम अंतर-वाह्य के रहस्यों का उद्घाटन कर सको,
मेरी शुभकामनाएं!
वो मुस्कुराया,
और मौन ही रहा,
हम कुछ देर आराम से बैठे रहे,
और फिर अपने-अपने रास्ते चल दिए|

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