Tuesday, June 23, 2009

कौन हो तुम?

तुम एक सिहरन, एक अनुभूति, एक दीप्ति हो,
तुम्हारी याद श्वासों में विलयित मेरे अस्तित्व का अभिन्न अंग,
तुम्हारी गुंजायमान कुसुमित हंसी मेरे मन का मधुर संगीत,
तुम्हारी अदायगी,एक जादूगरनी का चुम्बकीय सम्मोहन
तुम एक मानवी हो, एक कृति या जीवनी शक्ति?
सर्वत्र विद्यमान, प्रकाशमान, गतिमान तुम्हारा सौंदर्य,
क्या सूर्य तुम्हारे ही तेज से आलोकित है?
क्या चाँद तुम्हारी ही शीतलता से सिक्त है?
कितना अभिभूत और असहाय हूँ मैं तुम्हारी,
इस आकर्षक, ओजस्वित, रागमय सौंदर्य के सम्मुख
ऐ प्रिय - अधुरा हूँ मै तुम बिन,
परन्तु भावों के उधेड़बुन में किन्कर्त्व्यविमूध मै,
तुम्हारा आलिंगन करू? या तुम्हारा वंदन?

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